
लेकिन इस संधि की मियाद 2012 मे खत्म हो रही है और उसके बाद इसका कोई औचित्य नहीं रहेगा.
आधे अधूरे तरीको से इस चुनौती से निपटने की कोशिश ने स्थिति को और मुश्किल कर दिया है. दुनिया के दो देश जो सबसे ज्यादा कार्बन उत्सर्जन कर रहे हैं, वे किसी सीमा पर एकमत नही हो पा रहे है और इसके कारण आगे भी कोई बेहतर तस्वीर नज़र नहीं आ रही है.

अबतक की विफलता के कोई मायने नही है क्योकि वैसे भी सयुक्त राष्ट्र मे हम ज़्यादातर फ़ैसले आखिरी समय मे लेते है जब कोई और चारा नही बचता.
दुनिया का बढता तापमान हर एक देश की समस्या है और एक साथ इससे निपटने के अलावा कोई चारा नही है.
2007 मे बाली मे ये तय किया गया था कि कोपेनहेगन सम्मलेन मे क्योटो संधि के बाद की समस्या को सुलझा लिया जाएगा. उस नज़र से कोपेनहेगन में “करो या मरो” वाली स्थिति है.
पर अंदाज़ा है कि इस सम्मेलन मे चीन और अमरीका जो सबसे बड़े कार्बन उत्सर्जक हैं, उनके बीच बात अटकेगी.
उन्हे ग़रीबी हटाने के लिए उर्जा चाहिए और लगभग नब्बे प्रतिशत उर्जा जीवाश्म ईंधन से बनाया जाता है.
समय बदल गया है , लेकिन स्थिति वही है.
क्योटो संधि मे कार्बन बाज़ार की जो रूपरेखा मैंने तैयार की थी वो काफी महत्वपूर्ण है. कार्बन बाज़ार का मतलब है कि किसी भी देश या उद्दोग के पास कार्बन उत्सर्जन की जो सीमा उपलब्ध है अगर वो उस तय सीमा से कम उत्सर्जन करता है तो अपनी बची हुई उत्सर्जन सीमा को वो किसी दूसरे देश को बेच सकता है .
विकासशील देशो को कार्बन बाजार मे कारोबार करने की ज़रूरत नहीं पड़ती है क्योकि उनके उत्सर्जन पर कोई सीमा नहीं बांधी गई है और वे स्वच्छ विकास प्रणाली का इस्तेमाल करते है.

अफ्रीका केवल तीन प्रतिशत उत्सर्जन करता है तो उसे कार्बन उत्सर्जन बहुत थोड़ा कम करना है और उसे स्वच्छ विकास प्रणाली के लिए बहुत कम पैसा मिला है.
इसे बदलने की ज़रूरत है.